विश्वास की एक बूँद

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rm8rpyiv4xe0y43wvbThis short story was first published at Pragyata Magazine on 25 March 2018.

पापा के जिद करने पर वल्लभ इस बार रामनवमी के लिए अपनी दादी के घर ठहरने के लिए चला गया। छोटे में वल्लभ को अपनी दादी बहुत पसंद थीं पर जैसे जैसे वो बड़ा होता गया वो उनसे दूर होता गया। शायद इसलिए कि दादी हर बार उसके गाँव आने पर वही पुरानी गाँव की और दादा जी की कहानियाँ ले कर बैठ जातीं। कोई इंसान एक ही तरह की कहानियाँ कितनी बार सुने। वैसे भी जो कहानियाँ वो सुनाती थीं उस पर एक छोटा बच्चा ही विश्वास कर सकता था। और कहानियाँ तो कोई सुन भी ले पर दादी की जिद कि वल्लभ रामनवमी उनके गाँव में ही मनाये और अपने हाथ से ही पूजा करे यह बात उसे खटकने लगी थी।

इसलिए जब वल्लभ सोलह साल का हुआ तब उसने जिद करके दादी के यहाँ जाना बंद कर दिया। “रामनवमी की छुट्टी नहीं होती। पढ़ाई छोड़ कर आया तो बहुत नुकसान होगा।” ऐसा कहकर वो हमेशा उन्हें टाल देता। और जो दूसरी छुट्टियां उसे मिलती उनमें वो दूसरी जगहों जैसे कि मुंबई में अपनी बुआ के घर या फिर गोवा में अपने मामा के घर चला जाता। उन जगहों पर हर बार वो कुछ नया कर सकता था। अब वह बीस साल का हो चुका था। चाहता तो इस बार भी पढाई के नुकसान का बहाना बना कर मना कर सकता था पर पापा चाहते थे कि वो दादी को मनाने में उनकी मदद करे। उनको लगता था कि दादी का गुस्सा पोते पर है इस वजह से तबियत ख़राब होने पर भी कानपुर उनके साथ रहने के लिए आने के वजाय इस रामनवमी के बाद सब कुछ छोड़ कर अयोध्या जाना चाहती हैं। इसलिए उन्होंने ये जिम्मेदारी वल्लभ के सर डाल दी कि कैसे भी करके दादी को मना कर वो कानपुर ले आये। उन्हें विश्वास था कि वल्लभ के बोलने पर वो मान जायेंगी। आखिरी मिनट तक वल्लभ यही सोचता रहा कि पूरा परिवार पिपरी जाएगा, इसलिए वह थोड़ा शांत था पर जब उसके पापा ने उसके हाथ में उसकी अकेले की टिकेट थमाई तो उसका दिमाग घूम गया। इतने सालों बाद दादी से अकेले मिलने जाना उसे अजीब लग रहा था पर उसके पापा नहीं माने। उन्होंने उसे अकेले भेजने की ठान ही ली थी।

हार कर वल्लभ अकेले ही निकला। एक बैकपैक में ठूसे हुए थोड़े कपडे, मम्मी का दिया टिफ़िन, और एक पानी की बोतल, फ़ोन का चार्जर, इतना सामान ले कर वह घर से निकला। निकलते समय दोपहर थी। वल्लभ ने कान में इयरर्प्लग्स ठूसे और सारे रास्ते गाने सुनते हुए गया। उसे दादी पर बहुत गुस्सा था। उसने मन ही मन ठान लिया था कि वो दादी से कुछ ज्यादा बात भी नहीं करेगा। गाँव पहुँचते पहुँचते रात हो गयी। जब दादी के घर पहुँचा तो देखा कि दरवाजा खुला था और अन्दर झूले पर उसकी दादी बैठी हुई ऊँघ रहीं थी। इतने सालों में दादी में आये परिवर्तन को देख वल्लभ को बहुत तकलीफ हुई। पिछली बार जब उसने उन्हें देखा था तब भी वह बूढ़ी ही थीं पर इस बार तो वो बहुत ही कमजोर लग रही थीं। चेहरे के भाव तो उसकी पुरानी वाली दादी के ही थे पर अब शरीर एक छोटे बच्चे जितना हल्का हो गया था। हाथ पैरों की हड्डियां अलग से नजर आ रही थीं। बाल पूरे ही सफ़ेद हो गए थे। चेहरे पर झुर्रियाँ अब दुगुनी हो गयी थीं। शायद उसके जूतों की आवाज ने ऊँघती दादी को चैतन्य कर दिया। वल्लभ  ने देखा कि जैसे ही दादी की नजर उस पर पड़ी उनके दुबले पतले चेहरे पर एक छोटे बच्चे जैसी ख़ुशी छा गयी।

“आ गया वलभा ? कितना बड़ा हो गया।” उनके मुँह से निकला और वो झट से उठ कर उसकी तरफ आने लगीं।

वल्लभ ने आगे बढ़कर दादी के पैर छुए। दादी ने उसके सर पर प्यार से हाथ फेरा फिर अचानक ही उससे चिपक कर रोने लगीं। वल्लभ को बहुत अजीब लगा। दादी को कैसे चुप कराना चाहिए उसे मालूम नहीं था। उसने दादी को धीरे से थपथपाया और बोला “अरे, रोने की क्या बात है दादी। मैं आ गया ना। चुप हो जाओ।” थोड़ी देर में जब वो शांत हुईं तो उन्होंने उसे आँगन में लगे झूले पर बिठाया और किचन से नारियल के लड्डू और पानी ले आयीं। खुद अपने हाथ से उन्होंने उसे लड्डू खिलाया और फिर उसके पास बैठ गयीं। दोनों ने थोड़ी देर बैठ कर बात की फिर वल्लभ मुँह हाथ धो कर खाना खा कर सोने चला गया।

अगले दिन तडके वल्लभ की आँख कुछ खटपट होने की वजह से खुली। उसने अपने मोबाइल में समय देखा। सुबह के पाँच बज रहे थे। वो उठ कर बाहर आया तो देखा कि दादी आँगन को हमेशा की तरह बैठ कर धो रही थीं।

“अरे दादी, इतनी कमजोरी में ये सब करने की क्या जरूरत है ?”

“अरे वलभा, उठ गया ? मुझे लगा कि अभी थोड़ी देर सोयेगा। अच्छा उठ गया तो ठीक ही हुआ। मैं पानी गरम कर के लाती हूँ, नहा ले। कल रामनवमी है तो आज से ही सारी तैयारी शुरू करनी है। राम जी की पूजा करेगा ना ?”

“दादी, मैं ये सब पूजा पाठ करने नहीं आया। मैं तो आने वाला भी नहीं था। पर पापा को लगता है कि मेरे चार पाँच साल रामनवमी पर ना आने की वजह से आप मुझसे गुस्सा हैं और इसलिए ही कानपुर नहीं आना चाहती। अब वो चाहते हैं कि मैं आपको वहाँ आने के लिए मनाऊं। और सही भी है। आपकी उम्र अब ये सब करने की नहीं है।” वल्लभ ने झाडू की तरफ इशारा करते हुए रूखे स्वर में बोला। “मेरी बात मानिए तो मेरे साथ कल ही शहर चलिए। वहाँ मम्मी आपका अच्छे से ध्यान रखेगी।”

शायद वल्लभ  का स्वर कुछ ज्यादा ही रुखा था। दादी के चेहरे पर मायूसी छा गयी। “तो क्या तू कल पूजा नहीं करेगा ?” उन्होंने रुआँसी आँखों से उसकी तरफ देखा।

वल्लभ को दादी का मायूस चेहरा और रुआँसी आँखे देख बड़ी तकलीफ हुई। शायद उसे ऐसे नहीं बोलना चाहिए था। लेकिन सच यही था कि वो गाँव में रहना नहीं चाहता था। पर दादी की ऐसी हालत देखने के बाद वो दादी को अकेले छोड़ कर जाना भी नहीं चाहता था। उसने कुछ सोचा, फिर दादी के पास आकर बोला “उठो, पहले यहाँ आकर बैठो।” ऐसा कहते हुए उसने दादी को सहारा दिया और झूले तक ले गया। दादी अभी भी बहुत दुखी थी पर वल्लभ की बात मानकर बैठ गयी। जब वो ठीक से बैठ गयीं तो वल्लभ भी पल्थी मारकर उनके बगल में बैठ गया और बोला “अच्छा बोलो, आप क्या चाहते हो ? यही ना कि मैं रामनवमी की पूजा करूँ ?”

दादी चुपचाप बैठी रही। उनकी चुप्पी में उनकी हाँ है समझ कर वो आगे बोला “ठीक है। मैं आज से कल रात तक जैसे आप बोलोगी वैसे ही करूँगा। बिना किसी तीनपाँच के आज रात को दादा जी वाली कहानी भी सुनूँगा और कल रामनवमी की पूजा भी आपके बोले अनुसार ही करूँगा। फिर जैसा आपने सिखाया था राम जी के सामने ग्यारह नारियल फोड़ कर उनसे आशीर्वाद भी लूँगा। ठीक है ना ?” इतना सुनते ही दादी के चेहरे पर ख़ुशी छा गयी। वो कुछ बोलने ही वाली थीं कि वल्लभ आगे बोला। “पर मेरी भी शर्त है। परसों सुबह आप मेरे साथ कानपुर चलेंगी और अब से वहीँ हमारे साथ रहेंगी। मेरी शर्त मंजूर है तो बोलिए ?”

थोड़ी देर सोचकर एक छोटे बच्चे की तरह हाँ में सर हिलाते हुए दादी बोलीं “ठीक है वलभा। राम जी की अगर ऐसी ही इच्छा है तो यही सही। अब तो नहा ले। तब तक मैं यहाँ सफाई करके रंगोली डाल देती हूँ। फिर तेरा कमरा भी ठीक कर दूँगी।”

“कोई जरूरत नहीं है। जब तक मैं यहाँ हूँ, जो भी काम है मुझे बोलो, मैं करूँगा।” ऐसा बोलकर वह उठा और झाडू ले कर आँगन साफ़ करने लगा। रंगोली दादी ने ही डाली। नहा धो कर उसने थोड़ा बहुत जितना याद था संध्या वन्दना की और फिर दादी के निर्देशानुसार राम लक्ष्मण और सीता जी की मूर्ति को नहलाया, उन्हें नए कपडे पहनाये, उनका श्रिंगार किया। उन्हें धूप, दीप दिखाकर, दादी का बनाया हलवा पूरी का भोग चढ़ाया और आरती की। फिर बेसुरा ही सही रामरक्षा स्तोत्र का पाठ करके थोड़ी देर आँखें मूँद कर बैठ गया। असल में उसे राम जी पर ध्यान करना चाहिए था पर उसे ये सब करना नहीं आता था इसलिए सिर्फ आँखें बंद करके बैठा रहा। ध्यान के बाद दादी के साथ मिलकर जो प्रसाद चढ़ाया था उसे खा कर वो बड़े पंडित जी को अगले दिन की पूजा के लिए बुलाने गाँव के दुर्गा मंदिर की ओर निकल गया।

रास्ते में उसने देखा कि गाँव में कितना कुछ बदल चुका था। अच्छे बदलाव यह थे कि बिजली की व्यवस्था तो पहले ही हो गयी थी, अब लोगों के पास मोबाइल वगैरह भी रहने लगे थे। स्कूल भी पक्का बन गया था। पर अच्छे से ज्यादा वल्लभ का ध्यान बुरे बदलावों पर गया। पहले जिन खेतों में वल्लभ अपने गाँव के दोस्तों के साथ खेला करता था वो अब खाली पड़े थे। गाँव में पानी की बड़ी समस्या थी। जो पहले के झील, कुएं वगैरह थे, वो सूख गए थे। वल्लभ के पुराने दोस्तों के परिवार गाँव छोड़ शहर जा बसे थे।  गाँव की खूबसूरती जैसे मंद पड़ गयी थी। एक आध दुकानों में वल्लभ के हमउम्र लडके बीड़ी पीने में लगे थे। गाँव का पुराना दुर्गा मंदिर ही बस एक ऐसी जगह थी जो जैसी वल्लभ को याद थी अब भी वैसी ही थी। वल्लभ ने मंदिर में देवी के दर्शन किये और फिर पंडित जी को ढूँढा। जब पंडित जी नहीं मिले तो उसने वही मंदिर के प्रांगण में बैठकर इंतज़ार करने की ठानी।

“आप दुर्गा अम्मा के पोते हैं?” किसी की आवाज सुनाई दी।

वल्लभ ने मुड़ कर देखा। एक पंद्रह-सोलह साल की लड़की देखने में थोड़ा जानी पहचानी सी मंदिर की सीढ़ियों में खड़ी थी। उसने पीले रंग की साडी और चमेली के फूलों का गजरा पहना हुआ था। उसका रंग सांवला और आँखें बड़ी बड़ी थीं। जब वल्लभ ने जवाब नहीं दिया तो लड़की बोली “उन्हीं के पोते हैं ना आप ?”

“हाँ, आप कौन ?”

“नहीं पहचाना ? मैं भौमि, यहाँ के बड़े पंडित जी की बेटी। बचपन में आपके साथ मिलकर मंदिर का प्रसाद चुराती थी ?”

ये बात सुनते ही वल्लभ के चेहरे पर मुस्कान छा गयी। उसे वो पुराने दिन याद आने लगे। भौमि वल्लभ की बहुत अच्छी दोस्त थी। पता नहीं क्यों वह उसे बिल्कुल ही भूल गया था।

“हाँ, याद आया। काफी समय हो गया इसलिए…”

“हाँ, समय तो हो गया। मैंने सुबह ही सुना कि आप गाँव आये हैं। क्या सच में आप दुर्गा अम्मा को लेकर चले जायेंगे।”

“यहाँ अकेले रहना उनके लिए ठीक नहीं।”

ये बात सुनकर भौमि हँस पड़ी।

“क्यों, क्या हुआ ? मैंने गलत तो नहीं कहा।” वल्लभ ने पूछा।

“कुछ नहीं। आपकी बात थोड़ा अजीब लगी। दुर्गा अम्मा आपके पिताजी की अम्मा हैं। आपसे इतनी बड़ी हैं। उम्र में भी और तजुर्बे में भी। आपको नहीं लगता कि यह निर्णय उनको ही लेने देना चाहिए कि उनके लिए क्या ठीक है और क्या नहीं ?”

“तो क्या तुम कह रही हो कि मुझे उनकी चिंता नहीं करनी चाहिए ?”

“आप उनकी कहाँ, आप तो अपनी चिंता कर रहे हैं। सच बताइये क्या आपको लगता है कि इस उम्र में वो अपने उस घर को छोड़ कर जाना चाहेंगी जहाँ उन्होंने अपने सारे अच्छे बुरे दिन काटे हैं ?”

“शायद तुम्हें नहीं पता कि वो वैसे भी सब कुछ छोड़ कर अयोध्या जाने वाली थीं। अकेले वहाँ इस उम्र में भटकने से क्या ये बेहतर नहीं कि वो हमारे साथ कानपुर में रहें ?”

“मुझे तो पता था, पर शायद आपको नहीं पता कि इसका कारण भी आप ही हैं।”

इससे पहले कि वल्लभ कुछ पूछ पाता मंदिर के अन्दर से आई किसी की आवाज ने दोनों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया “भौमि, किससे बात कर रही हो ?”

“अम्मा जी के पोते हैं, पिताजी।” भौमि ने उत्तर दिया। पंडित जी बाहर निकल के आये। ना जाने कैसे वल्लभ ने उन्हें मंदिर के अन्दर देखा ही नहीं। उसे लगा कि वहाँ उसके अलावा कोई भी नहीं।

“अरे छोटे शास्त्री जी, आप गाँव का रास्ता कैसे भूल गए ?” पंडित जी ने रूखे हुए स्वर में बोला।

वल्लभ को उनके बोलने का ढंग बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। फिर भी उसने शांत स्वर में उत्तर दिया “दादी ने आपको कल की पूजा के लिए बुलाया है। वहीँ बताने आया था। और जो भी पूजा सामग्री चाहिए मुझे बता दें, मैं ले आऊँगा।”

“ना, ना, चिंता मत करिए। हर बार सारा इंतजाम मैं ही करता हूँ। इस बार भी कर लूँगा। आप जाइए, जो थोड़े बहुत समय के लिए गाँव आये हैं तो गाँव देखिये। अब इसके बाद वैसे भी फिर कभी आना होगा नहीं आपका।” बोलकर पंडित जी वापस चले गए।

पंडित जी के बात करने के अंदाज से वल्लभ को ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके चेहरे पर जोर का थप्पड़ मार दिया हो। “चलता हूँ भौमि।” बोलकर वल्लभ वहाँ से गुस्से से निकल गया। घर पहुँच कर वह दादी पर चिल्लाया “कैसे आदमी हैं वो पंडित जी। बात करना भी नहीं आता। और आप, जब हर बार पूजा की तैयारी वो करते हैं तो आपने मुझे उनसे पूछने के लिए क्यों बोला ?”

“कितना गुस्सा करने लगा है वलभा ? पंडित जी को भी तेरे इतने साल ना आने से बहुत दुःख पहुंचा है इसलिए गुस्से में कुछ बोल दिए होंगे। चलो कोई बात नहीं। वैसे भी तुझे अभी बहुत काम है। अभी नहा धो कर फिर से संध्या वंदना करनी है। फिर राम जी को दोपहर का भोग लगाना है। और फिर उन्हें सुलाना भी तो है।”

“नहाना ? संध्या वन्दना ? ये सब सुबह कर तो लिया। फिर से क्यों ?”

“दिन में तीन बार करना होता है ना वलभा ? शहर जा कर सब भूल गया क्या ?”

“इतना सब आज के समय में कौन करता है दादी ? मैं दुबारा नहाने नहीं जा रहा।” बोलकर वल्लभ अपने कमरे में जाने लगा।

“तो फिर मैं भी कानपुर नहीं जाऊँगी।” बोलकर दादी किचन में घुस गयी।

मरता क्या ना करता, वल्लभ ने नहा धो कर संध्या वन्दना की। फिर दादी के बनाए खाने को भोग लगा कर छोटी सी पूजा की। उसके बाद राम जी के मंदिर के परदे डाल कर उन्हें सुला दिया। उसके बाद खाना खाने जब बैठा तो उसे भौमि की बात याद आई। उसने दादी से पुछा “भौमि कह रही थी कि आप अयोध्या मेरी वजह से जा रहे थे। ऐसा क्यों ?”

“अच्छा, भौमि मिली मंदिर में ? ये तो तूने पहले बताया ही नहीं।”

“हाँ मिली थी। पर वो सब छोड़ो, जो मैंने पूछा उसका जवाब दो।”

“बताऊंगी, पर कल की पूजा के बाद।” कह कर दादी ने बात टाल दी। 

शाम की संध्या वन्दना और पूजा के बाद वल्लभ दादी के साथ आँगन में बैठा हुआ था जब पंडित जी आये। वो अपने साथ पूजा का सारा सामान ले कर आये थे। दो चार लोग और भी थे। सबने मिलकर पूजा की जो तैयारी एक दिन पहले हो सकती थी की। सब काम जब हो गया तो दादी के कहानी सुनाने की बारी आई। उस वक्त तक भौमि और गाँव के और भी बहुत से लोग उनके घर पर इकठ्ठा हो गए थे। वल्लभ को विश्वास ही नहीं हुआ कि गाँव वाले हर साल उसी कहानी को सुनने यूँ ही इकठ्ठा होते हैं। और चूँकि इस बार शायद ये आखिर बार हो रहा था तो और भी ज्यादा लोग आये थे।

दादी ने हर बार की तरह उसी अंदाज में कहानी शुरू की। वो बोलीं “तो बात तब की है जब वल्लभ के दादा जी अभी वल्लभ जितना ही बड़े रहे होंगे। उस समय वो बहुत गुस्से वाले थे। हमारी शादी को तीन  साल हो गए थे पर कोई संतान नहीं थी। अचानक एक दिन हमारे आस पड़ोस के परिवारों के बच्चे किसी बीमारी से मरने लगे। सबको लगा कि क्योंकि मुझे बच्चे नहीं हो रहे थे तो मेरी बाँझ नजर उनके बच्चों को लग रही थी जिसकी वजह से वो मर रहे थे। पहले तो यह बात सिर्फ अडोस पड़ोस में ही होती थी। फिर धीरे धीरे पूरे गाँव में फैलने लगी। मैंने बहुत कोशिश की कि वल्लभ के दादा जी को इसका पता नहीं चले पर एक दिन यह बात उनके कान में पड़ ही गयी। उन्हें बहुत गुस्सा आया। पहले तो उन्होंने झगड़ कर सबकी धारणा बदलने की कोशिश की फिर शान्ति से समझाने की भी कोशिश की पर किसी ने नहीं सुनी और तो और लोगों ने हमें विवश कर दिया कि हम गाँव छोड़ कर चले जाएँ। पर वो यूँ ही शान्ति से जाने वाले नहीं थे। उन्होंने भी गुस्से में आकर गाँव वालों को श्राप दे दिया कि इस गाँव में अब कभी किसी को कोई संतान नहीं होती और तो और इस गाँव की धरती भी बाँझ हो जायेगी। ऐसा श्राप दे कर वो मुझे ले कर पड़ोस के गाँव चल दिए। श्राप तो उन्होंने दे दिया पर उनका मन उस दिन के बाद बहुत दुखी रहने लगा। यह अपराध बोध कि उन्होंने अपनी ही मातृभूमि को श्राप दे दिया उन्हें मन ही मन बहुत कचोटता। प्रायश्चित के लिए उन्होंने राम जी की साधना करना शुरू किया। दिन बीते, फिर महीने और साल भी बीतने लगे। वल्लभ के दादा जी ने खाना पीना सब छोड़ दिया। जब उन्होंने छोड़ दिया तो मैं भी कैसे खाती। मैंने भी उनके साथ वानप्रस्थ जैसा जीवन जीना शुरू कर दिया। एक रात वल्लभ के दादा जी को राम जी ने दर्शन दिए। उन्होंने इनको आदेश दिया कि हम अपने गाँव लौट जाएँ और अपनी जमीन में खुदाई करें। वहाँ हमें राम जी, सीता जी और लक्ष्मण जी की मूर्ति मिलेंगी। उसकी पूजा करें। हर रामनवमी घर के सबसे छोटे बेटे से उनकी पूजा कराये और भूमि से क्षमा प्रार्थना के लिए नारियल चढ़ाएं। ऐसा करने से जो श्राप इन्होंने इस भूमि को और यहाँ के लोगों को दिया उसका असर अगली छः पीढ़ियों में धीरे धीरे चला जाएगा और गाँव में फिर खुशहाली आएगी। ये सुनकर हम वापस गाँव आये और इस जमीन की खुदाई की। जमीन के अन्दर से हमें यह मूर्तियाँ मिलीं।” दादी ने मूर्तियों की तरफ इशारा किया और आगे बोलीं “हमने विधिवत इनकी पूजा करना शुरू कर दिया। धीरे से गाँव में फैला सूखा ख़त्म हुआ और धीरे धीरे यहाँ फैली दूसरी महामारियां भी दूर होने लगीं। एक ही साल के अंदर वल्लभ के पिता का जन्म हुआ और दूसरे घरों में भी बच्चो की किलकारियां सुनाई देने लगीं। तब से हमारे घर के सबसे छोटे बेटे से हम इन राम जी की हर रामनवमी पूजा कराते हैं।”

“अब कहाँ दादी। सबसे छोटे शास्त्री जी तो गाँव आना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं।” कोई बोला।

“हाँ, शायद इसीलिए इतने सालों बाद गाँव में फिर से सूखा पड़ने लगा है।” कोई दूसरा बोला।

“अरे सूखा छोड़ो, मैंने तो सुना है कि बुधिया के दोनों बच्चे किसी अनजान बीमारी से ग्रस्त हैं। इतने साल से सही पूजा ना होने से श्राप फिर से अपना असर दिखाने लगा है।” जिन लड़कों को सुबह वल्लभ ने बीड़ी पीते देखा था उनमें से एक बोला।

“क्या तुम लोग फालतू की बातें ले कर बैठ गए। जाओ सब अपने अपने घर। कल सुबह तड़के पूजा के लिए आना भी तो है।” बड़े पंडित जी ने थोड़ा सख्त आवाज में बोला। लोग जाने लगे। पंडित जी ने एक बार वल्लभ की ओर देखा और फिर वो भी उठकर उसकी दादी से विदा ले कर भौमि के साथ चले गए।

“देखा दादी, अब अपनी ये कुल्हाड़ी अपने ही पैर गिरने लगी है। क्यों झूठमूठ की कहानियों से इन लोगों को बेवकूफ बनाती हो। अब देखो, सब गाँव में पड़ने वाले सूखे और बीमारी के लिए हमारे परिवार को जिम्मेदार बताने लगे हैं।” वल्लभ ने घर के खाली होते ही दादी को झडपा।

“झूठ नहीं है वलभा। झूठ बोलकर मुझे क्या मिलेगा ?”

“देखो दादी। मैं ना तो इन गाँव वालों की तरह बेवकूफ हूँ और ना ही छोटा बच्चा, जो ऐसी बिना सरपैर की कहानियों पर विश्वास करूँ। सच बताओ क्यों बनायी ऐसी कहानी ?”

दादी थोड़ी देर चुप बैठीं रहीं। फिर बोली “अच्छा, ठीक है, कल पूजा के बाद सब बताती हूँ।” ऐसा कहकर वो उठकर अपने कमरे की तरफ चली गयीं।

वल्लभ थोड़ी देर वहीँ बैठा रहा। सोचने लगा कि “शायद दादा जी अपने गाँव को बहुत याद करते रहे होंगे। पर जाते समय कुछ बुरा भला बोल कर जाने की वजह से वापस आने के लिए कुछ कहानी बना दी होगी। और उनकी किस्मत कि लोगों ने उनकी बात पर विश्वास कर लिया। इससे ज्यादा क्या हुआ हो सकता है ? ना जाने इतना सा सच बोलने में दादी को क्या तकलीफ है। हर चीज को पूजा के बाद के लिए टालती जा रही हैं।” यहीं सब विचार करते हुए वल्लभ उसी झूले में बैठे बैठे सो गया।

अगले दिन सुबह वल्लभ को किसी ने नहीं उठाया। जब आँख खुली तो देखा कि सूरज सर पर चढ़ आया था। “दादी ने पूजा के लिए नहीं उठाया ?” सोचकर वल्लभ को बड़ा आश्चर्य हुआ। वो उठ खड़ा हुआ। खड़े होने पर उसे और भी ज्यादा आश्चर्य हुआ यह देखकर कि जहाँ वो लेटा था उस एक झूले को छोड़कर बाकी सब गायब था। घर नहीं, दादी नहीं. गाँव नहीं, सब जगह रेत ही रेत। गरमी इतनी कि उसका अंग अंग जल रहा था। ये सब क्या था ? क्या वो सपना देख रहा था ? उसने अपने आप को जगाने की कोशिश की। पर कुछ हुआ नहीं। वो इधर उधर देखने लगा। क्या करे, कैसे इस मुसीबत से निकले। दूर दूर तक एक पक्षी भी नहीं दिख रहा था। प्यास से उसका गला सूख रहा था। वो एक दिशा में थोड़ी दूर पैदल चलने लगा, इस उम्मीद के साथ कि शायद कही थोड़ा पानी मिल जाए। पर सारी कोशिश बेकार। थक हार कर वो वापस अपने झूले के पास आकर बैठ गया।

“सबकुछ गायब हो गया। तो फिर ये झूला अभी तक यहाँ क्यों है ?” उसने यूँ ही अपने आप से सवाल किया। अचानक उसे लगा कि उसे झूले के नीचे की रेत को हटा कर देखना चाहिए। वो तुरंत उठ कर रेत को हाथ से हटाने लगा। थोड़ी देर तक उस जगह की खुदाई करने पर वल्लभ के हाथ कुछ सख्त चीज लगी। उसने जब आगे संभल के खोदा तो उसके हाथ घर की वहीँ मूर्तियाँ लगीं। “इसका क्या मतलब है ?” उसने फिर से सवाल किया। वो सोच ही रहा था कि उसे महसूस हुआ कि कोई झूले पर आकर बैठा है। वल्लभ झूले के नीचे से बाहर आया। अब तो उसके आश्चर्य की कोई सीमा ही नहीं थी। उसने खुद को ही झूले पर बैठा पाया। उसका मुँह खुला का खुला रह गया।

“वल्लभ, मैं वल्लभदेव शास्त्री हूँ। तुम्हारा दादा।”

“दादा जी ? सब कहते तो थे कि मैं बिल्कुल आपके जैसा दिखता हूँ पर मुझे कभी…..” वल्लभ कहते कहते रुक गया।

वल्लभदेव मुस्कराए “विश्वास नहीं हुआ ?” उन्होंने प्रश्न किया।

वल्लभ कुछ नहीं बोला।

“वैसे ही जैसे तुम्हें इन मूर्तियों की कहानी पर विश्वास नहीं हुआ। है ना ?” वल्लभ को चुप देखकर वो आगे बोले “सच है। विश्वास सिर्फ किसी के एक ही कहानी को बार बार सुनादेने से तो होता नहीं। इसलिए ही मैंने तुम्हें दिखाने की सोची।” वल्लभदेव से अपने पोते की और देखा और पूछा “जानते हो यह कौन सी जगह है ?”

“नहीं।”

“यह हमारा गाँव है। जो श्राप मैंने यूँ ही गुस्से में आकर बिना सोचे समझे इस गाँव को दिया था वो अगर राम जी की कृपा ना होती तो अब तक फल कर मेरे गाँव को इस रेगिस्तान में बदल देता।” उन्होंने वल्लभ की तरफ देखा। वल्लभ के चेहरे पर अविश्वास पानी की तरह झलक रहा था। वो मुस्कराए और आगे बोले “विश्वास नहीं होता ना ? किसी की कही एक छोटी सी बात इतना बड़ा अकाल ले आये तो किसे विश्वास होगा ? मुझे भी नहीं हुआ था। मैं तो सिर्फ गुस्से में आकर कुछ बडबडाकर अपनी पत्नी को लेकर निकल गया था। और एक दूसरे गाँव में नयी जिंदगी शुरूकर आराम से रहने लगा। एक रात मुझे सपने में यही जगह दिखी। बस ये झूला नहीं था। मैं सोच ही रहा था कि मैं कहाँ हूँ कि एक आवाज आकाश में गूंजी। वो आवाज बहुत दर्दभरी थी। उसने बोला – क्यों रे वल्लभ, मैंने तुझे छोटे से बड़ा किया। तेरी हर जरूरत को पूरा किया और तूने मुझे ही श्राप दे दिया। और मेरी नींद खुल गयी। उसी समय तुम्हारी दादी ने भी एक सपना देखा। सपने में राम जी रोये जा रहे थे। जब उसने पुछा कि क्या हुआ, तो राम जी बोले “बचपन से हमेशा सत्य बोलने का निश्चय करके वल्लभ ने हमेशा मेरी साधना की। वह मेरा बहुत प्रिय है। पर अब उसने मुझे बड़ी दुविधा में डाल दिया है। उस दिन जो श्राप भूमि को देकर वह निकला, उसे सत्य करना मेरी विवशता हो गयी है। पर भूमि भी मेरी बहुत प्रिय है। ऐसे में उसे इतना कष्ट देने से वो कष्ट मुझे ही हो रहा है। हम दोनों ने एक दूसरे को अपना सपना बताया। यह बात बहुत आश्चर्य में डालने वाली थी। अगले ही दिन मैंने किसी से सुना कि मेरे गाँव में सूखा पडा है। जमीन बंजर होती चली जा रही है। लोग गाँव छोड़कर जा रहे हैं। मुझे खुद पर बहुत शर्म आई। मैं पश्चाताप की आग में जला जा रहा था। तब तुम्हारी दादी ने सलाह दी कि हम राम जी का कठिन तपस करें और उनसे ही इस समस्या का निधान पूछें। मैंने सब कुछ भूलकर राम जी का सुबह शाम जाप करना शुरू किया। धीरे धीरे हमने खाना पीना सब छोड़ दिया। तीन साल बाद एक दिन राम जी मेरे ध्यान में आये। उन्होंने मुझे इस जगह को खोदकर उनकी मूर्तियाँ निकालने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि घर में पैदा हुए सबसे छोटे बेटे को मेरे प्रायश्चित को आगे बढाना होगा। हर रामनवमी उनके सामने भूमिपूजा करके उनसे क्षमा माँगनी होगी। ऐसा करने से अगली छः पीढ़ियों में इस श्राप का पूरा असर चला जाएगा।” वल्लभदेव ने वल्लभ की ओर देखा और बोले-

“इस घर के सबसे छोटे बेटे अब तुम हो। अंधविश्वास मानकर तुमने उस प्रायश्चित को बीच में ही रोक दिया। तुम्हारी दादी बूढ़ी हो चली हैं फिर भी कोशिश करने में लगी हैं कि यह प्रायश्चित पूरा हो। तुम्हारी ही तरह तुम्हारे पिता को भी मेरी बात पर विश्वास नहीं था। पर बेमन ही सही वो मेरी बात मानकर पूजा करते हुए आया। तुम्हारे ना आने पर सिर्फ अपनी माँ के मन की शान्ति के लिए उसने ही आकर पूजा की। पर शायद राम जी की बात का सही तरह से पालन नहीं हुआ इसलिए ही गाँव में वापस वही अकाल आ रहा है। तुम्हारी दादी इस बात से बहुत दुखी हैं। इसलिए ही वह अयोध्या जाकर इस परिवार के लिए बड़ा तपस करके राम जी से क्षमा प्रार्थना करना चाहती हैं।”

इतना सब कहकर वल्लभदेव कुछ समय के लिए सर झुका के बैठे रहे। फिर आगे बोले “देखो वल्लभ, मेरे मुँह से निकली एक गलत बात ने कितने लोगों का जीवन बर्बाद कर दिया। यह कोई छोटा दुष्कर्म नहीं था। मैंने अपनी मातृभूमि को श्राप दिया। उस भूमि के बच्चों को श्राप दिया। कितने परिवार अपना घर छोड़ कर चले गए। शायद इसलिए ही राम जी ने छः पीढ़ियों को प्रायश्चित करने का आदेश दिया। मैंने अपना सारा जीवन राम जी की सेवा में लगा दिया। पर फिर भी मैं अब भी अपनी मातृभूमि का दोषी हूँ।  मैंने निश्चय किया है कि जब तक इस भूमि को दिया मेरा श्राप पूरी तरह से विफल नहीं होता, तब तक मैं यहीं भटकता रहूँगा।” ऐसा कहकर वो उठकर जाने लगे।

“दादा जी ” वल्लभ ने बुलाया। वल्लभदेव रुके। “क्या ये सब कोई सपना है ?” वल्लभ ने पूछा। दादा जी मुस्कराए और बोले “इसका निर्णय मैं तुमपर छोड़ता हूँ।”

वल्लभ ने आँखें खोली और देखा कि वह झूले पर एकदम सीधा बैठा हुआ था। घंटों इसी तरह बैठे रहने पर भी उसे किसी भी तरह का दर्द या थकान नहीं थी। सुबह होने को आई थी। वो उठा और चुपचाप घर से निकल गया। उसका मन बड़ा अशांत था। क्या सच था और क्या झूठ उसे समझ नहीं आ रहा था। वो पुराने दुर्गामंदिर के पीछे खड़े बरगद के पेंड के नीचे जा बैठा। शायद कुछ घंटे बीते होंगे यूँ ही बैठे बैठे जब भौमि वहाँ आई।

“अच्छा, तो आप यहाँ छुपकर बैठे हैं। और सारा गाँव ये सोच रहा है कि आप शहर भाग गए।”

“भाग ही जाना चाहिए था शायद।”

“क्यों, कल रात तो आप पूजा की तैयारी में इतनी मदद कर रहे थे। आज क्या हुआ ?”

“तुम नहीं समझोगी, भौमि। आज एक अजीब सा सपना देखा मैंने। अब समझ नहीं आ रहा कि उसे सपना मान कर भूल जाऊं या फिर सच मान कर……नहीं, नहीं, सच मानने का मतलब मेरी सारी जिंदगी ही बदल जायेगी। मैं जैसा हूँ, वैसा ही खुश हूँ।”

भौमि हँस पड़ी।

“अब क्यों हँस रही हो ?”

“आपने कहा ना कि आप खुश हैं। पर चेहरे से तो आप बिल्कुल भी खुश नहीं दिख रहे। आपकी बातों से लगता है कि जो भी सपना आपने देखा उसे सिर्फ जिंदगी में आने वाले बदलाव के डर से आप सच नहीं मानना चाहते। इसका मतलब कहीं ना कहीं आप उसे सच जानते हुए भी अस्वीकार कर रहे हैं। ऐसे दुविधा में कोई कहीं भी रहे, खुश कैसे रह सकता है ?”

“पर मैं अपनी सारी जिंदगी गाँव में नहीं बिता सकता। दादा जी की बात अलग थी। उनके अन्दर इतनी तपस शक्ति थी कि गाँव में उनकी की हुई पूजा से तुरंत बदलाव आना शुरू हो गए। पर मेरे अन्दर ऐसी कोई शक्ति नहीं।”

“ऐसा आपको लगता है। उस परिवार में जन्म लेने का मतलब ही है कि आप उन जिम्मेदारियों को पूरा करने में सक्षम हैं। खुद पर ना सही, राम जी पर तो विश्वास कीजिये। एक बार विश्वास जो जम गया, फिर जीवन अपने आप ही आसान हो जाता है। अब चलिए।” कहकर भौमि ने अपना हाथ आगे बढाया। वल्लभ ने एक गहरी साँस ली और भौमि का हाथ पकड़ कर उठ खड़ा हुआ।

 

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दूर्वा का महत्व

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(गणेश पुराण, उपासना खंड, ch 66-67)

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Image Source- Google Search

गणेश पुराण में दूर्वा का महात्म्य समझाने के लिए कौण्डिन्य ऋषि अपनी पत्नी आश्रया को एक कहानी सुनाते है, जो इस प्रकार है-

एक बार नारद गणपति लोक जाकर गजानन को पृथ्वी लोक के मिथिला राज्य के राजा जनक के अहंकार का वर्णन देते हैं । वे बताते हैं कि कैसे अपने ब्रह्मज्ञान के अहंकार में राजा जनक अपने आप को तीनो लोकों का स्वामी और रक्षक कहते नहीं थकते ।

यह सुनने के बाद गजानन ब्राह्मण का रूप ले कर राजा जनक के पास जाते हैं और उनसे कहते हैं “हे राजन, आपकी प्रसिद्धि सुनकर मैं आपके राज्य आया हूँ । मुझे खाने को कुछ दीजिये, मैं बहुत समय से भूखा हूँ । आपके पास तो किसी भी चीज़ की कमी नहीं, तो आप मुझे तब तक खाना खिला सकते हैं जब तक मेरा पेट भर नहीं जाता । अगर आप मुझे पेट भर कर खाना खिला देते हैं तो मैं आपको सौ यज्ञों के पुण्य जितना पुण्य दूंगा ।”

यह सुनकर राजा जनक ब्राह्मण देव को सम्मान के साथ बैठाते हैं और अपने सेवकों को आदेश देते हैं कि ब्राह्मण देव को तब तक खाना खिलाया जाए जब तक उनका पेट नहीं भर जाता । इसमें वैसे भी कौन सी बड़ी बात थी । जो राजा सारी सृष्टि का संचालन कर सकता है वो क्या एक ब्राह्मण को पेट भर कर खाना नहीं खिला सकता ?

ब्राह्मण देव खाने लगे । जो जो उनके सामने रखा जाता, वो वो सब खा जाते । एक के बाद एक पकवान आते गए और ब्राह्मण देव खाते गए । लोगों ने राजा से शिकायत करना शुरू की । “ये ब्राह्मण नहीं कोई राक्षस है, लगता है । इतना खाना कोई कैसे खा सकता है ।”

फिर भी राजा जनक ने उन्हें खाना खिलाते रहने का आदेश जारी रखा ।

लोग अपने अपने घर से खाना लाने लगे । राजमहल के साथ साथ लोगों के घर का भी अनाज खाली हो गया । पर ब्राह्मण देव का पेट तो अभी भी नहीं भरा था । वे बोले “राजा जनक तो पूरे विश्व के दाता हैं, ऐसे में वे कैसे मुझे भूखा जाने दे सकते हैं ?”

जनक के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं था । यह उनके अहंकार की हार थी । ब्राह्मण देव उनके राजमहल से असंतुष्ट चले गए ।

पर फिर ब्राह्मण देव का पेट भरा कैसे ?

ब्राह्मण देव यहाँ वहाँ भटकते हुए उसी राज्य के एक बहुत ही गरीब ब्राह्मण त्रिशिरस और विरोचना के घर पहुंचे । वहाँ वे दोनों उसी समय अपनी पूजा समाप्त करके बैठे थे । ब्राह्मण ने उनसे कुछ खाने के लिए देने को कहा । इस पर विरोचना ने पूजा के बाद बची एकलौती दूर्वा घास ब्राह्मण को दिखाते हुए कहा “हे ब्राह्मण देव, हमारे घर पर तो कुछ भी नहीं, सिवाय इस एक दूर्वा घास के । आप इसे ही ग्रहण करें ।”

ब्राह्मण देव ने उसे बड़े मन से खाया और खाते ही उनका पेट भर गया । फिर ब्राह्मण देव वापस अपने गणपति रूप में आ गए । उन्होंने उन दोनों को कोई वर पूछने को कहा ।

उन दोनों ने पूछा “जब तक जीवन है तब तक हम आपकी भक्ति में लगे रहें और उसके बाद जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्ति पायें ।” गणपति ने उन्हें यह वरदान दे दिया ।

इस कहानी की रोचक बात यह है कि यह कृष्ण के एक चावल के दाने से पेट भरने वाली कहानी से थोड़ा सा मिलती है । जैसे कृष्ण ने एक चावल का दाना खाकर पांडवों को बहुत बड़ी मुसीबत से बचाया था, यहाँ गणपति ने एक दूर्वा खाकर विरोचना और त्रिशिरस को मुक्ति का आशीर्वाद दे दिया ।

पुराणों में मिलने वाली बहुत सी कहानियों की तरह यह कहानी भी भक्ति के महत्त्व को दर्शाती है । भक्ति और अहंकार साथ में नहीं रह सकते। अगर आप अहंकार से भरे हैं तो एक ना एक दिन किसी ना किसी रूप में उस अहंकार का दमन होना निश्चित है । इसलिए भक्ति को चुनिए, अहंकार को नहीं ।

कहानी गणेश जी के पेट की

एक बार प्रलय के बाद जब नयी सृष्टि के निर्माण का समय आया तब तभी उत्पन्न हुए ब्रह्मा, विष्णु और शिव भ्रमित अवस्था घूम रहे थे | वो जानना चाहते थे कि वो क्यों उत्पन्न हुए, उन्हें क्या करना है, उनका धर्म क्या है ?

इस उत्तर की खोज में वो बहुत समय तक भटकते रहे | जब उन्हें कुछ समझ नहीं आया तो उन तीनों ने कड़ी तपस्या करना शुरू किया | कई सालों की तपस्या के बाद उन्हें गणेश जी के दर्शन हुए | उन तीनों ने गणेश जी की आराधना की और उनसे पुछा कि हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है ?

उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उन तीनो को बारी बारी उनके जीवन का उद्देश्य बताया | उन्होंने ब्रह्मा जी से कहा कि क्योंकि तुम राजस से उत्पन्न हुए हो तुम सृष्टि का निर्माण करोगे | विष्णु, तुम्हारी उत्पत्ति सत्व से हुई है इसलिए तुम्हारा कार्य सृष्टि की रक्षा करना होगा | हर, तुम तमस से उत्पन्न हुए हो इसलिए तुम्हारा कार्य विनाश करना होगा |

पर सृष्टि का निर्माण करना कैसे है ? और कहाँ से शुरू करना है ? ये बहुत बड़ा सवाल था | तो ब्रह्मा जी ने गणेश जी से मार्गदर्शन पूछा |

उसके जवाब में गणेश जी ने साँस अन्दर खींची और उस साँस के साथ ब्रह्मा जी गणेश जी के पेट में पहुँच गए | वहाँ गणेश जी ने अनगिनत ब्रह्मांड देखे | उनमें से एक ब्रह्मांड को ब्रह्मा ने अपनी शक्ति से तोड़ा और उसके अन्दर देखा | वहाँ उन्होंने अपने ही जैसे एक और ब्रह्मा देखे और साथ ही साथ उन्होंने विष्णु, इन्द्र, प्रजापति, शंकर, वायु, वरुण को भी देखा | उन्होंने पूरी सृष्टि को देखा | इसके अलावा जिन जिन ब्रह्मांडो को ब्रह्मा देख पाए उन सब में उन्होंने अपने जैसे ही एक और ब्रह्मा को सृष्टि का सृजन करते पाया | ये सब देखकर ब्रह्मा को सृष्टि के निर्माण का रहस्य पता चला |

ये कहानी गणेश पुराण (Chapter 12-14, UpAsanA KhaNda) में ब्रह्मा जी ने व्यास जी को तब सुनाई थी जब व्यास जी पुराण लिखने से पहले अपने अहंकार में अपना ज्ञान भूल गए थे |

Brahmaandas in Ganesha's stomach (edit)

In this sketch, I have portrayed the form of Ganesha which Brahma witnessed in the above account. He has four hands holding spear, bow, shield and lance. His beauty surpasses the full moon.  His head is shining with a diadem. His single tusk surpasses  the tusks of VarAha in splendour and He has a superb trunk more fearful than those of AirAvata.  The sketch also portrays what Brahma saw inside the stomach of Lord Ganesha.

 

Short Story- A Wife’s Dilemma

“A wife’s dilemma” short story was first published at Pragyata magazine.

“I can’t. I can’t walk anymore”, declared Swarnima. The jungle did not seem to have an end and the hermitage of Rishi Shukamukha was nowhere to be found. To her, it seemed, that they had been walking for long hours, and by now, she was certain that they had lost their way. She felt too tired to walk anymore under the scorching sun and her frustration towards her husband made her reluctant to go any further. She looked around desperately for some cool place to rest. There were trees, tall ones, but somehow, not one of them deigned to offer any shade. While her eyes were searching for a shelter, her hands mechanically reached to the pallu of her saffron saree, which looked beautiful with all the embroidery and mirror work. As she wiped her face carefully, she noticed that her pallu was torn in a few places.

“This was a beautiful saree”, she looked disappointedly at her husband, and added sarcastically, “I still don’t understand what stopped you from beating the hell out of those people.”

She expected her husband to feel ashamed, look down, or at least try to console her, but he seemed absolutely indifferent to her complaints. She did not know what irritated her more- his apathy towards her or her not being able to comprehend his self-assured composure. She looked around again, and her sight fell on a big old banyan tree in the distance, behind her husband.

“Oh, Thank God!” she sighed and walked towards the tree. Her husband followed her silently.

“Now the only thing that I desire is some water.”

After sitting in the shade of the banyan tree, she tried to fan herself with the torn pallu. It brought a new wave of frustration, noting the condition of her saree. “My mother had done the embroidery with her own hands. It was her last gift to me.”

“You can still keep it safe. The embroidery is not spoiled. Just don’t wear it anymore.”

She recognized that tone. Living with him for two years, she could easily correlate his mood with the tenor of his voice. She realized that her husband was getting frustrated with her tantrums. But instead of calming down, she felt even angrier. “It is his fault that we are lost. His fault that everything we were travelling with is gone. I put hours into the preparation for this trip and that too, in this condition.” She gently caressed her pregnant belly without putting a break to her thoughts, “And he let those robbers take our belongings without a fight. Our bullock cart, our bulls, our food, our water, our gifts for Rishi Shukamukha, everything is gone. He did not oppose even when they took my jewelry, even my mangalsutra. Only gods can tell what cowardliness has struck upon him. He did not oppose even when they started beating him…”

For the first time in the two years of their marriage, Swarnima was unable to read the mind of her husband. Her relationship with him was such that even before he uttered a word, she would rightly guess what he wanted. Maybe, it was because she had fallen in love with him even before meeting him personally. She remembered the first time when she saw him. Her cousins had forced her to watch a combat match and she was getting bored until he appeared on the scene. Seeing him, her pulse had raced instantaneously. He had a handsome face, more handsome than any other man she had met before. His muscular body was shining due to the oil massage, his body tone was that of the aval payasam sweetened by jaggery. His mustache and beard were trimmed and matched the expressions of his face. He seemed an incarnation of Kaamdeva to her. She smiled, remembering how she had first misunderstood his name to be Kaamdeva, only to find out eventually that his name was Vaamdeva.

As luck would have it, Vaamdeva too had fallen for her, of which fact she was totally unaware of at the time. She had imagined him to be unreachable as far as she was concerned. So, when his marriage proposal came, she felt as if she was being asked to get married to a king. Even after the two years of their marriage, her love for him was unaffected and with time, she had also developed utmost respect for him and for his dedication to wrestling, which he practised as a sadhana, and not just a game. He always stood up for justice, offering his service to the people who needed his help. No goons dared to attack their village because of him and his students, whom he taught with love and patience.

“So what happened today? Why did he prefer getting beaten by those robbers, instead of fighting? They were ready to kill him, but he….”

Thinking about the incident sent shivers down her spine. She was half asleep when the robbers had attacked. She had heard a sudden commotion and felt a hand on her shoulder shaking her up from her slumber. When she opened her eyes, she noticed that their bullock cart was surrounded by five masked robbers. But she did not feel scared for even a second, for she was sure that the robbers would recognize her husband and obviously back off.

She heard one of them yelling, “Climb down from the cart and if you want to live, make no sudden movements!” The authority in his voice, gave her the clue that this one was the leader. He had a strong build and a high-pitched voice.

She expected her husband to say something. She thought that he will challenge those guys for a combat. But, when her husband climbed down the cart without making a scene, she felt confused. Then, Vaamdeva gave her a hand to climb down. They were surrendering without a fight. She stared her husband’s face for a moment, but could not make anything out of his expressions. He seemed peaceful, without any complaints or anger. It made her so angry that instead of taking his help, she climbed down by taking the support of the bullock cart.

One of the robbers took the reigns of the cart and two of them sat at the back. In a few moments, they began to ride back, probably to their den. Now, there were only two left. The leader and another one with a short physique. The short one stood right behind her husband. Though, his face was covered with a dirty white cloth, Swarnima could say that he looked ugly. His hair was long and a few random strands were kind enough to cover a part of his repulsive face.

She then looked at her husband, thoughtfully, “Maybe he was waiting for this moment. Maybe now he will challenge them for combat. The short one doesn’t stand a chance, and this leader, ah well, he’s no match too.” and felt relieved.

But when the leader asked Swarnima to hand over to him the jewelry she was wearing, her husband nodded.

“No, I am not giving him anything. Why are you so silent?” she questioned her husband.

“Swarnima, just do as he says. Don’t make an issue of it.”

“No, I will not. What’s wrong with you? Why won’t you fight them?”

“Yes, why don’t you fight us?” said the leader and laughed. The short robber followed and made a mockery of them. He pushed Vaamdeva again and again to provoke him for a fight. Every time he did so, Swarnima felt like slapping him, but Vaamdeva remained silent. Then Swarnima noticed the leader signaling something to the short robber. And the next moment, the short robber pulled out a sharp knife and stood ready to attack Vaamdeva.

“Just give them the jewelry, Swarnima.” spoke Vaamdeva. His voice was still calm, his face unaffected by the adversity that had befallen them. He did not look down. His expressions refused to carry any sense of shame.

Unable to make sense of his bizarre behaviour, Swarnima yelled, “What has gotten into you? You are a fighter, a wrestler. Why are you not fighting?” The two robbers exchanged glances with each other.

Sitting under the banyan tree, she realized now, what a big mistake she had committed. Her words had alerted the leader. He had immediately whistled and the three robbers who had taken away their cart turned back. The next moment, all five of them attacked Vaamdeva, mistaking him for a soldier. When the short guy tried to stab her husband with his knife, she intervened. It saved Vaamdeva, but the robbers pushed her to the ground and snatched all her jewelry. She was fortunate that the struggle did not harm her unborn child. Her anger turned into guilt. She looked at the wounds on her husband’s hands and neck but thankfully, he too had not taken any serious injury.

When the robbers left, Swarnima expected her husband to be very angry with her for not listening to him and causing such trouble. But he did not show any sign of resentment. He immediately stood up and came to her checking if she was alright. It was her guilt of being the cause of avoidable violence that was really the cause of her frustration but she didn’t have the courage to admit it.

Now that she gave his behavior a serious thought, she realized that he had seemed distracted even before they had started their journey. In fact, he was distracted since the last time he had gone for a wrestling competition at the royal court. It was his suggestion that they take the journey to get Rishi Shukamukha’s blessings. Now she wondered if he had some other reason for meeting the old sage.

“How far do you think it is?” she asked without being sarcastic anymore.

“I don’t know. Maybe a few more miles.”

“I think we have lost our way, and without any food or water, I don’t know how we will survive.”

Her husband remained silent. Then she saw him standing up and looking upwards, calculating something in his mind. In a flash, he started climbing the tree.

“What are you trying to do?”

“I guess I will be able to find the right direction or at least, some water source from the top.”

The tree was tall and she feared that if he lost his grip, it would be disastrous. But, she refrained from commenting further and silently watched him climb.

When he came down, he spoke to her, “Swarnima, there are some people coming this way. I don’t know if they are villagers or robbers or someone else. But, I think you should hide.”

“I should hide? And what about you?”

“I don’t think they will harm me.”

“No, I am not hiding alone. Either, we both are hiding or we both are staying.”

She did not wait for her husband to respond. She caught hold of his hand and dragged him behind the big bushes nearby. Swarnima sat holding her breath, closed her eyes and joined her palms to pray to the gods, “Let it be some help and not another calamity.”

When she opened her eyes and peeked from the gaps of the bushes, she realized that her husband had left her side and was lying down fully prostrate on the road with his arms stretched out towards some people. She shifted her position to see who they were and noticed an old sage with a charming glow on his face accompanied by a few of his followers.

“Rishi Shukamukha”, the words parted from her lips with a sense of devotion. Though, she had seen the sage long ago when she had visited him with her parents, she recognized him easily. The sage’s face was calm and glowing due to the years he had spent in severe penance. His hair had turned white and he had those lovely welcoming expressions that one sees in a grandfather’s face. He was also famous for being as kind in granting boons as Lord Shiva himself. Maybe that’s why people called him an incarnation of Lord Shiva. She felt relieved, finding the sage standing there. Finally their troubles were over.

“Rise up, O devotee of Mother Kaamaakshi, and tell me what is it that you seek?”

The Rishi’s voice brought joy to Swarnima’s heavy heart. All her anger and frustration vanished. She smiled, thinking that they were already blessed with the darshana of the old sage and now he would give her husband a boon.

She saw her husband rising. Though she was unable to see Vaamdeva’s face, she knew that his eyes would be filled with joyous tears. Then she heard him saying in a humble voice, “O incarnation of Lord Shiva, the knower of the cosmos, take me into your refuge and teach me how to get rid of this cycle of life and death.”

At first, the words did not sink in but when they did, her mind went blank. She sat there like a statue. Was it the world around her that started fading or was it her eyes that were blurring her view, she could not tell. She closed her eyes tightly. A few minutes ago, she had thought that they were lucky that Rishi Shukamukha gave them darshana, but now she was not sure.

In the last two years, Vaamdeva had never expressed anything of this kind. Swarnima slowly regained herself and started pondering on her husband’s words. “He wants mukti from the world, but did he forget that I too live in the same world or is it that…..he does not care? And if he does not care, why did he marry me? Maybe he has got bored with me, or maybe he is saying so because I became irritated with him during the journey? No, no, he WAS distracted for the last few days. So, this is the reason why he had planned this trip in the first place? No, no, it must be the effect of the old sage, which made him ask such a boon. Does the sage know about me? Will he consider my feelings before granting such a boon?” Her mind again cursed Vaamdeva, “Oh, why did he ask for such a boon? Has he gone mad? Does he think he is Siddhartha, the prince who left his wife and child for the sake of Sannyasa? Did he not think once about what will I do without him? I am no Yashodhara, I have no treasure or kingdom to take care of my child. Did he not think about the child I am carrying? How can he forget the responsibilities he has towards the child?” She felt attacked by so many thoughts at once that she thought her head would explode. She held her head tightly. Her heart feared that the old sage would say that magical word “Tathastu” any time now and her life would be destroyed. She did not want to hear it.

“And what shall I do with the one you are hiding in the bushes?” she heard the sage saying instead.

His words brought Swarnima back to her senses. She realized that she was still hiding. She felt that she had been there for hours and the blessed sage had taken too long to respond to her husband’s foolish demand. She came out of the bushes. No one had moved an inch. She walked and stood right next to her husband, she brought together her palms in the namaskara mudra and bowed her head in salutation to the sage.

“Will you not speak your heart, dear daughter? Your husband here has spoken his. And I am bound to fulfil his wishes, but it will change your life completely. Hence, ask for anything. Even if you ask for a kingdom, I will grant it to you. I see that you are going to be a mother soon, hence I will grant you two wishes. Tell me now, what is it that your heart desires?” Rishi Shukamukha asked Swarnima.

Swarnima’s eyes were fixed at the feet of Rishi Shukamukha. Listening to his words, her mind relaxed a bit. Though a kingdom was a tempting offer, her heart did not hanker after it. She only wanted everything the way it was, her husband by her side. And more than that, she wanted to ask her husband the reason for his turn of heart. She spoke, with as much restraint in her voice as was possible for her to muster, though her eyes betrayed her emotional trauma, “O great guru, you might have sensed my troubled mind and that is why you have offered to grant me even a kingdom. But, a kingdom is not what my heart desires. Right now, the only thing that will soothe my heart is a few minutes with my husband. I will ask my next boon only after my first boon fulfills.”

“Tathastu” and he gave them some time alone.

Swarnima looked at her husband, expecting to see downcast eyes. But he seemed to carry no burden of guilt. He was as calm as he was during the robbers’ attack. She, on the other hand, could not speak a word. He seemed so peaceful that she felt like keeping that image of him in her heart forever.

“I am sorry. I did not think of you or our child before asking the boon. But this is what my heart desires. Life is so ephemeral, I do not know which day will be my last. I want to know why life is so. I want to know who made it so. I want to know what happens to the atma when a person dies.”

“Is that why you planned this trip?”

“No, no, but…..”

“Would you be able to live and concentrate on learning what you seek with the knowledge that you did not fulfil your responsibilities towards us? Would it not haunt you? Do you not love me anymore? Have your feelings towards me vanished?” She asked with tears rolling down her eyes.

He did not say a word, but his expressions changed.

Restraining her emotions she said: “Please, do not think that I am being rhetorical. I am not. I sincerely want to know. If you think you would be able to give your hundred percent to your pursuit without a sense of guilt, I will let you go. And I assure you that I will not keep any anger or hatred towards you in my heart.”

“I don’t know. My desire for seeking the ultimate truth is irreversible, but I also don’t want to do any injustice to you or our child. As I said before, life is ephemeral, I don’t know how long I will live. And, so, I want to follow my heart. My mind is set, but yes, my love and feelings for you are unchanged. My heart cares for our child. I cannot say that I do not desire to see him. But, I also cannot wait to grow old, Swarnima. What if that never happens? What if I die without fulfilling my desire to learn under Rishi Shukamukha?”

“I never knew you had any such desire.”

“Even I did not know. I assure you that I had no plan for asking any such boon. I had planned this trip just to clear my head and also to get blessings for our child. But, as soon as the Rishi appeared, my heart could think of nothing but what I asked. I think it is for the good. I was anyway too confused after my last wrestling competition at the royal court.”

“What had happened there? What changed?”

“Nothing, the boy was too young to compete. He stood no chance. He might have been participating only for money and might not have thought about the consequences before challenging me. Though, I tried to dissuade him from wrestling with me, he did not listen to me. And then when the wresting started, he did not make it beyond the first round. We wanted to take him to a Vaidya. But he fell, even before we could do anything.”

“You mean he died?”

“Yes. A heart attack, they said.”

“Is that why you did not fight with those robbers?”

“No, of course not. I could have fought them. But, I could not guarantee that I would be able to save you from any harm. Fighting other wrestlers in a combat ground is different, Swarnima. These people were robbers. They don’t care about the rules of a combat. They would surely have attacked you to keep their control over the situation. And, also….” he paused and added with a thoughtful expression, “I kind of felt that this was nothing, but a test.”

“A test?”

“Yes, I had this strong feeling inside my head that maybe it was all arranged by Rishi Shukamukha.”

Swarnima was quiet. Then she asked again, “I still don’t understand your wish. I still do not see why you desire to leave everything?”

“I don’t know. But, when I looked into the eyes of Rishi Shukamukha, a strong desire spontaneously erupted and I could not stop myself from asking that boon. That moment I forgot about the world and those words just came out of my mouth. And let me be honest with you. I now feel happy, much better than ever before. I feel as if a big burden has been taken away from my heart” he smiled calmly, but his smile faded on seeing the pool of tears in Swarnima’s eyes.

“No, don’t worry about me.” spoke Swarnima, trying to control herself.

“I do worry about you and our child, Swarnima. I do love you both. But, I am confused. I don’t know what is right.”

She looked at him, trying to understand what he meant.

Suddenly, she felt a jolt through her body and the next moment Swarnima opened her eyes and realized that she was still hiding in the bushes.

“And what shall I do with the one you are hiding in the bushes?” she heard the sage saying and saw her husband and the sage waiting for her to come out. Was she dreaming, she did not know. She could not understand what was happening to her. She hesitantly got up and walked up to where her husband was standing. She looked at her husband once, but his eyes were fixed upon the sage. His face was calm and he did not seem to have any idea of what had just happened to her. Then she looked at Rishi Shukamukha, who gave her an understanding smile. She brought together her palms in the namaskara mudra and bowed her head in salutation to the Rishi.

“Will you not speak your heart, dear daughter? Your husband here has spoken his. And I am bound to fulfil his wishes, but it will change your life completely. Hence, ask for anything. Even if you ask for a kingdom, I will grant it to you. Tell me now, what is it that your heart desires?” Swarnima heard the old sage repeating the very same words that she thought she had heard just moments ago.

The only thing that was different now was that the sage did not offer her two boons. Was her vision real? Had he really offered her two boons, of which she had already availed one? Was it all her imagination or was it his maya? She felt overwhelmed and took a little time in absorbing everything that was happening.

” O great guru, please accept my salutations. It is very kind of you that you have considered us worthy enough to have your darshana. And I am overwhelmed by knowing that you considered my wishes before granting my husband the boon he has asked for. As his wife, I think it’s my responsibility to make sure that he gets what he desires and fulfills his life’s purpose. Hence, it is also my responsibility to ensure, that whenever he renounces the householder’s life and enters your tutelage to seek the ultimate truth, he does it with complete lucidity and without any confusion in his mind about what is right and what is wrong. Also, as a mother it is my responsibility to see to it that no injustice happens to my child as well. Likewise, as a husband even he has certain duties towards me and our son. Hence, O great guru, let no injustice happen. Grant my husband what he has wished for, only when he attains the vivekam that he has attended to all his duties towards me and our children.”

“Very thoughtful wish, indeed, dear daughter. I am impressed. Your wish will be fulfilled and you will also recover what had been taken from you in this jungle. You will live a long, happy life with your husband and when the time comes, I will take you both under my tutelage. Now go home.” saying so Rishi Shukamukha raised his both hands in the Abhaya Mudra and left the place with his pupils.

Avishi by Saiswaroopa Iyer

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Long before the times of Draupadi and Sita
Immortalised in the hymns of the Rig Veda
But largely forgotten to the memory of India
Is the Warrior Queen with an iron leg, Vishpala

Brought up in the pristine forest school of Naimisha, Avishi reaches the republic of Ashtagani in search of her destiny. When Khela, the oppressive King of the neighbouring Vrishabhavati begins to overwhelm and invade Ashtagani, Avishi rises to protect her settlement. But peril pursues her everywhere.

Separated from her love, her settlement broken, with a brutal injury needing amputation of her leg, can Avishi overcome Khela?

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“I am the Queen! This will be my throne!” The seven-year-old chirped leaping from the middle of the porch towards the broken mortar which served as a mock throne. “You will be my guard!”

“Guard?” the man pondered scratching his unkempt beard.

“No.” He shook his head and smiled seeing her indignant eyes. “I will be the Queen’s elephant.” He beamed.

Sukratu stepped out of the house to see his daughter in action, perching herself on the tramp Loha’s back, pretending in all earnestness that he was her elephant. He smiled and was about to set out for his duty as the night guard of the King. A sudden lightning appeared in the eastern skies. Sukratu had barely walked a few paces when a deafening thunder made him instinctively turn towards home. He heaved a sigh, finding Loha shielding the girl as if he would, his own child.

“Father, don’t go.” The girl pleaded.

Sukratu smiled and shifted his gaze towards the sky. He saw dark clouds loom over the city. The monsoon winds had started to make their presence felt. He had to reach the palace soon. “Isn’t my little Queen brave?” He called out.

The girl nodded. He saw the fear fade. From her eyes. From her heart. She knew she was the queen! Pride filled his heart. His mind ached to stay home but duty beckoned. Tearing his gaze away from the one he treasured the most in his life, braving the drizzle that would soon turn into a storm, he unwillingly walked towards the King’s residence. Sukratu’s house was in the third ring of the concentric structure of Vrishabhavati. In the centre, was the structure, that served as the residence of the king and as the centre of all trade activity of the city. Here no wealth or goods could change hands without the king’s knowledge and approval. The residences of the noblemen formed the two rings around it. The guards and soldiers forming the outermost circle with the citizens living around them.

As per the protocol, Sukratu approached General Ugra’s residence quite ahead of his reporting time— an hour before the moonrise. He walked into the empty courtyard. But the rain made it impossible for him to stand there any longer. He knocked at the giant wooden door fervently. The doors creaked as a strange woman clad in a dark indigo garment opened them and glared at him with a frown on her forehead.

General Ugra, Sukratu knew was never faithful to one woman. His superior’s romantic exploits were not his concern either. But something about the woman at the door disconcerted him. “Please let General Ugra know that…”

“He has already left for the palace!” The woman frowned before attempting to shut the door.

“What? How ca…” Sukratu’s words hung in air as the door slammed on his face and the woman disappeared from his line of vision all of a sudden. Something did not feel right. He knocked at the door again. Firmly this time, as though seeking answers. Any change in the reporting time would have been announced the day before and he remembered that nothing of the sort had happened. His knocks went unanswered. Frowning and muttering under his breath, Sukratu hurried towards an empty cowshed three houses away from Ugra’s place hoping to catch his companions who he knew would be equally surprised.

The first to arrive was Khela, the eighteen-year-old guard, holding a metal shield above his head. The newest addition to the King’s guard, Khela was related to General Ugra and Sukratu felt that his position in the King’s guard was largely a result of undue favours that Ugra showered upon an otherwise impudent boy.

“Sukratu! By the great Varuna, I should have come to you earlier!” Khela hurried towards him. Pausing for breath, he added. “Our platoon has been given a relief tonight! It was a sudden decision and I personally informed all the others.”

“Relief for tonight? That happens only when…”

“Our guarding hours change from night to day!” Khela completed in a hurry. “Now, come with me.” He turned towards the western direction and the javelin he held started to sway dangerously and came close to grazing Sukratu’s arm.

The older guard’s instincts made him dodge the cut. “Where?” Sukratu hissed, visibly annoyed, first with the fact that he was kept in dark about the change in guarding hours and then about Khela’s irreverent behaviour. “And watch who your weapon hurts, boy.”

Khela shrugged and changed the position of his weapon. “We are now going to the place.” He winked, stretching his hand in the direction. “Follow me, this is the only night we get to have some fun.”

Sukratu did not move. The place he knew implied the tavern where wine was served. “We cannot drink tonight, Khela. When do we have to report tomorrow? By sunrise?”

“You ask too many questions. The rest of us are there too!”

“That does not answer my question.”

“Well, I don’t know, and I don’t care to. The palace is paying for the wine. Are you coming or not?”

The last sentence sounded more like a threat than an invite. Sukratu had all the mind to give the youth a piece of his mind and storm back home. His daughter would be overjoyed to see him before she went to sleep. It gnawed at Sukratu’s heart every day to leave her under the care of Loha— the tramp who had begged him for shelter about six months ago and then became a part of his life. The girl liked him instantly and had begged Sukratu to let Loha live with them and he, despite his misgivings about the tramp’s origins and his unkempt appearance, could not refuse his only daughter. Over time, Sukratu felt grateful for Loha’s company. Now his daughter did not have to be all by herself every night. The guard’s home would have been unguarded if not for that stranger. Sukratu brushed aside these thoughts and had almost decided to go home when the thought of meeting other senior guards and clarifying the confusion struck him. He followed Khela’s lead, making no attempt to hide his displeasure.

When they reached the tavern, Sukratu to his dismay, found many of his brothers in arms deeply drunk. “When did they reach here and when did they…”

“Quite some time before. I just forgot to tell you in advance!”

Sukratu’s eyes scrutinized the men and women of the tavern who were serving wine to the guards. There were no other citizens or travellers in the tavern.

“Just for us, the whole night!” Khela said as if reading his thoughts, bringing him an earthen goblet.

The older guard accepted the goblet taking his first sip with a sense of foreboding.

“Where were you all the time, old friend?” The voice belonged to Tunga one of the senior guards in the platoon.

The grin on his friend’s face brought a smile to Sukratu’s lips. “Tunga, what is this about the sudden change in our guarding hours?”

“The King… that imbecile, has finally remembered that we are human too!” Tunga guffawed, emptying his goblet, waving vigorously at a woman of the tavern who obliged with a seductive wink.

She approached them, skilfully distributing her attention between both the men, winking at Tunga and pouting her lips at Sukratu. Her brows rose at Sukratu’s filled cup. “Don’t keep the Sura nor this Sundari waiting, my love…” Serving Tunga his wine, she placed her fingers upon Sukratu’s shoulders, digging her nails into his skin for a moment locking her gaze with his and turned around swiftly, letting her light upper garment rest on his face for a fleeting moment.

It was a wilful invitation and Sukratu knew it. His attention though was caught by the colour of the garment. The Indigo hued garment! All the women of the tavern wore clothes of the same colour. So did the woman he saw in General Ugra’s house! Was Ugra at home while the woman lied that he was at the palace? If the General and the whole platoon of the night guard were lying down drunk, who was minding the security of the King? Sukratu looked at the rest of the guards. No one seemed sober enough to talk. The only sober man Khela had disappeared!

“By the great Varuna!” Sukratu exclaimed aloud and rushed out, pushing the woman who tried to stop him away.

He raced to the King’s residence, as fast as his legs could carry him. The huge wooden gates of the structure were closed and secured from inside. The rain lashed drowning his cries. Misgivings regarding the King’s welfare made him shudder. He had to meet General Ugra. Something told him that the General had his own reasons to send the whole platoon of guards to enjoy a drunk night. He was a guard who had sworn to protect the King with his life. The general owed him an answer. Sukratu rushed to General Ugra’s house determined to confront him.

That, Sukratu realized was the biggest mistake of his life.

At the gates of the general’s residence he saw a familiar figure hurrying out of his house, a heavy bundle on his shoulders. “General Ugra!” he called out, feeling relieved.

The figure started, and the bundle fell to the ground. Sukratu came to a sudden halt as he realized it wasn’t a bundle after all, but a blood-drenched corpse. A stroke of lightning from the sky revealed the face and the very familiar greying curls. Sukratu froze for a long moment before he could speak.

 “K… King…”
Something hit him on the head even before he could utter the name. Sukratu staggered, reeling at the impact, clutching at his long sword in a vain attempt to defend the next move.

“Finish him!” The General shout behind him.

Before he turned around, Sukratu felt the cold metal tear into his back. Lightning struck revealing the contours of the person. Khela! The javelin stabbed him again. Thunder drowned his screams. Falling to the ground with the weapon still stuck to his back, Sukratu lifted his sword and managed to slash Khela’s palm though the latter, unlike him was vigilant and alert. Crawling away from the menacing duo, knowing very well that he could not last more than a few moments, Sukratu’s thoughts, went to his innocent daughter. She would now languish as an orphan remaining in dark about the monsters who killed her father. Or would they kill her too?

Sukratu would never know.
About the Author:
Saiswaroopa is an IITian and a former investment analyst turned author. Her keen interest in ancient Indian history, literature and culture made her take to writing. Her debut novel Abhaya, set in the times of Mahabharata was published in 2015. Avishi, her second novel set in Vedic India explores the legend of India’s first mentioned female warrior queen Vishpala.

She holds a certificate in Puranas from Oxford Centre for Hindu Studies. She is also trained in Carnatic Classical music and has won a state level gold medal from Tirumala Tirupati Devasthanams.

“The Dark Road” by Mayuresh Didolkar- A Micro-review

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“The Dark Road”, by Mayuresh Didolkar is a captivating murder mystery. It is a well-constructed plot with balanced humor.  The story of the victim Sanjyot is heart-breaking. She is the embodiment of the struggles of a teenager. The protagonist Prasanna is a fascinating character. I would love to read more mysteries solved by her.

The unweaving of  this murder mystery will keep you glued. I think this story is definitely a movie material.

I hope Mayuresh will come up with many more thriller stories like this.

You can buy the book Here.

Ganesha Sambhrama: My First Solo Art Exhibition

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Ganesha Sambhrama- my first solo exhibition was held from 14 May 2017 to 16 May 2017 at Bharani Art Gallery, Mysuru. Though, the exhibition started on 14th, for us (me and my husband Nithin), it started long before. Working on paintings (which was solely my job), getting them framed, sending invitations, working for promotion, there was a lot of preparations to be done. Also, I had to prepare myself to deliver a short speech during the inauguration and later explain each of the paintings, the story, the symbolism and how it was made to the visitors. Since, it was the first time I was to give a speech, I was quite nervous!

The event was inaugurated by Dr. Sarvamangala Shankar, the Vice Chancellor of Karnataka State Dr. Gangubai Hangal Music & Performing Arts University. Rajashekhar Kadamba, senior theater artist and Amshi Prasanakumara, the Assistant editor of Kannada Prabha were the chief guests of the event.

Dr. Sarvamangala Shankar inaugurating the exhibition

They were very appreciative of the paintings that I had displayed especially the painting of thirty two forms of Ganapati based on their dhyana mantras from “Uttara Kaamikagama” and “Mudagal Purana”.

Painting of Thirty Two Forms of Ganapati based on their dhyana Mantras

Other works that caught their attention included “Ganapati Homam”, “Ganesha Bhakti”, “Ganesha worshipping Shiva-Shakti”, “Ganeshini” and “Kangitan”.

When time came for my speech, for a moment, I got nervous and as a result, I forgot the speech I had prepared and instead gave completely new speech. But, to my surprise it was not bad at all.

I had this fear that after the main event, nobody would visit the exhibition. But, people kept visiting throughout the day. I think more than a hundred and fifty people visited in total. Considering that this was my first solo exhibition, getting this many visitors itself is an achievement. Another satisfying thing for me was the media coverage that the event received.

Here are some of the images of media reports about the event:

To any artist, selling a painting in his/her first exhibition is a big achievement. And with the grace of Ganapati I sold three works in which two were digital prints and one was original painting.

Here are the works that I sold-

Torana Ganapati

Abstract Ganapati

Ganesha Bhakti

I think what I loved the most about the entire exhibition was how some people came from distant places reading about my exhibition in newspaper or watching in local news channels. Their appreciation was my biggest achievement. Here, I am sharing some of the feedbacks that I received-

The most beautiful thing that happened in the course of the exhibition was also the most unexpected. Someone told a Swami ji from Vrindavana about one of my digital paintings wherein I have painted a story, an interaction between baby Ganesha and baby Krishna and the Swamiji liked it so much that he instantly composed a song on it.

Here is the digital painting and the song composed by Vrindavan Swamiji-

छोटे से नन्हे से कृष्ण गए, गम्पू के पास

माखन दिखाया तो गम्पू बोले, इसमें क्या खास

खाया नहीं तो तुम क्या जानो, माखन का स्वाद

रोने लगे जब झूठे झूठे (कृष्ण), हुआ विश्वास (गणेश को)

ले लूँगा माखन रोना नहीं, गम्पू फँसे तब

लिया जो माखन कृष्ण कहे, लड्डू चाहूँ अब

लड्डू छुपाया गम्पू ने तो, कृष्ण हँसे तब

जाता हूँ फिर मैं दुःखी होके, खाओ कैसे अब

गम्पू फँसे कुछ कर ना सके, ले लो लड्डू तब

ऐसी है लीला मनमोहन की, हँस के कहें सब

I feel so honored, I cannot describe it in words.

Here are some of the photos of the exhibition-

With Dr. Sarvamangala Shankar

Delivering my inauguration speech

With Sri Kaverappa Nellamakkada, senior artist and the owner of Bharani Art Gallery and my husband Nithin Sridhar

The positivity and the happiness, that I achieved during this exhibition is going to be with me for a long time. This experience has given me the confidence to go for another exhibition. If everything works out well, I would be holding another exhibition during the Navaratri. And I sincerely hope that those who could not come to this exhibition will come to my next exhibition.

To see all the paintings that I had displayed in the exhibition, please go through-

Ganesha Sambhrama- My First Solo Art Exhibition

P.S.- I will soon upload a video that I had recorded to give a virtual tour of my Exhibition to all my friends who could not make it to the event.

Short Story “Two Kinds”- Review

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Amy Tan’s “Two Kinds” is a story of the relationship of Jing-mei and her mother. I think many people can relate to the story because the conflict between the aspirations of parents and children is not so unusual.

The story takes you from where a daughter struggles for some recognition from her mother to where she stops caring and starts struggling for her own identity. The story also shows how a mother does everything to provide some chance to her children to become something in their life. But the generation gap results in conflicts. The children become too rigid or blunt and even the inspiring words of parents seem useless to children.

The story covers the struggle as well as the rigidness of Jing-mei. The protagonist, who is an adult Jing-mei, looking back in her life, describes her own attitude and failures and how she did things intentionally to hurt her mother. As a narrator the protagonist does not try to hide the wrong doings she committed in her childhood. In fact, she narrates it so beautifully that one understands those wrong-doing as nothing but just a phase of life. Hence, Jing-mei’s not learning piano properly or her poor performance at a talent show or her mentioning the dead children of her mother intentionally, does not make a reader  hate her.

Now when the protagonist talks about her thirtieth birthday, it becomes clear that she feels sad for letting her mother down again and again while growing up. She feels frightened with the thought that her mother has completely given up on her. But when her mother offers her the same piano, next to which they had argued in which she had used her mother’s dead children to win the argument, she takes it as a sign of forgiveness.

The story’s title becomes clear when, after the death of her mother, the protagonist while playing the same piano notices something that she had never noticed before. She realizes that, “Pleading Child” and “Perfectly Contented” are two halves of the same song. May be the incident represents that even after the generation gap her mother and she were not so different. After all, her mother desired only success and happiness for Jing-mei.

Book Review: Abhaya by Saiswaroopa Iyer

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If you are fan of Pauranic fiction, then I would recommend you Saiswaroopa’s “Abhaya”, based on the lore of “Narakasura”. The story has been written so profoundly that it hooks the reader instantly. The characters, their thought process, their weakness, their strength, everything has been portrayed excellently.

I personally loved the way the author has portrayed the character of Krishna and the relationship of Abhaya and Krishna. Abhaya’s straightforward character and her fight for the right makes the reader to immediately fall in love with her.

Short Story “A Worn Path”- Review

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“A Worn Path” by Eudora Welty is such a brilliant story to read. It gives warmth to the heart of the reader. Though, the protagonist Phoenix is old and poor, the way she speaks to the obstacles in her way clearly shows that she takes these challenges as an adventure. Writing a story of an old woman, who has none but a sick grandson and is forced to walk for so long for medicines, in such humorous way has really astonished me. I smiled reading her commentary over the bushes, and thrones, and scarecrow. I was surprised to see that she feared none even when the hunter pointed his gun towards her. And I was impressed with the way she stole that nickel that fell from the hunter’s pocket and later frankly asked for a nickel from the attendant to buy a paper windmill for his grandson. What a way to treat life! This story is like saying “When life gives you lemons, make lemonade.”